अबूझमाड़ में नक्सल खौफ पर जीत, रिश्तों की वापसी
9 साल बाद माँ से मिली बेटी, सास से मिला दामाद—जवानों ने खोल दिए बंद रास्ते


(कैलाश सोनी) नारायणपुर। नक्सल हिंसा और भय के साए में जी रहे अबूझमाड़ अंचल में अब तस्वीर बदल रही है। कोड़नार क्षेत्र में पुलिस बेस कैम्प की स्थापना ने वह कर दिखाया, जो वर्षों से असंभव माना जा रहा था। 9 साल से बिछड़ी बेटी आखिरकार अपनी मां से और दामाद अपनी सास से मिल सका। इस भावुक मिलन ने पूरे गांव को एकजुट कर दिया और स्वागत में हर घर से लोग सड़क पर उतर आए।

अबूझमाड़, जिसे लंबे समय तक नक्सलियों का गढ़ कहा जाता रहा, वहां परिवारों के बीच दूरी की सबसे बड़ी वजह डर और असुरक्षा थी। बेटी की शादी के बाद मायके लौटना खतरे से खाली नहीं था। रास्ते बंद थे, संपर्क टूटा हुआ था और भय जीवन का हिस्सा बन चुका था।
जवानों की तैनाती ने तोड़ा डर का घेरा
कोड़नार में पुलिस बेस कैम्प खुलने के साथ ही हालात में तेजी से बदलाव आया। क्षेत्र में नियमित गश्त शुरू हुई, आवागमन सुचारु हुआ और ग्रामीणों में विश्वास पैदा हुआ। इसी भरोसे के चलते बेटी और दामाद ने गांव पहुंचने का फैसला किया।
गांव पहुंचते ही मां-बेटी की वर्षों की पीड़ा आंसुओं में बह निकली। इस मिलन का दृश्य हर आंख को नम कर गया। ग्रामीणों ने इसे अबूझमाड़ के इतिहास का यादगार दिन बताया।
‘कैम्प खुला तो खुल गए दिल के रास्ते’
बेटी और दामाद का कहना है कि “पुलिस कैम्प खुलने की सूचना मिलते ही लगा कि अब अपनों तक पहुंचना सुरक्षित है। अगर यह कैम्प पहले होता तो शायद यह दूरी कभी नहीं बनती।”
उन्होंने जवानों का आभार जताते हुए कहा कि उनकी मौजूदगी ने जिंदगी को फिर से सामान्य बनाया है।
अबूझमाड़ में लौट रही सामाजिक रौनक
ग्रामीणों के अनुसार, सुरक्षा बढ़ने से अब लोग निर्भीक होकर आवाजाही कर रहे हैं। बच्चे स्कूल जा रहे हैं, बाजारों में चहल-पहल बढ़ी है और रिश्तों की डोर फिर से मजबूत हो रही है। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि सुरक्षा बल केवल कानून लागू नहीं कर रहे, बल्कि टूटे समाज को जोड़ भी रहे हैं।
डर से विश्वास तक का सफर
प्रशासनिक स्तर पर माना जा रहा है कि अबूझमाड़ में स्थापित पुलिस बेस कैम्प विकास और सामाजिक पुनर्निर्माण की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रहे हैं।
जहां कभी बंदूकें बोलती थीं, वहां अब रिश्ते बोल रहे हैं।




