नारायणपुर

नारायणपुर: बम्हनीकरीन/गंगेश्वरी माता का वार्षिक देवजतरा आज होगा समापन

आदिम संस्कृति का पर्व: बम्हनीकरीन/गंगेश्वरी माता का वार्षिक देवजतरा आज होगा समापन, 25 गांवों के देवी-देवताओं का हुआ सम्मिलन…

बम्हनी (नरायनकोट) का इतिहास

नारायणपुर, 26 मार्च 2025: (डॉ. भागेश्वर पात्र) बम्हनी गांव, जो जिला मुख्यालय से लगभग 7-8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, प्राचीन नारायणपुर के नाम से प्रसिद्ध है। यह नगर नागवंशी राजाओं के शासनकाल में ‘नरायनकोट’ के नाम से जाना जाता था। यह नगर नरायनदेव नामक नागवंशी शासक ने बसाया था, और यहां से प्राप्त ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि इस स्थान पर आदिवासियों की समृद्ध सत्ता थी। बम्हनी से प्राप्त लाल रंग की चौकोर और बड़े आकार की पक्की ईंटें, मृदभांड के अवशेष, सिक्के, शिव-पार्वती की काली पाषाण प्रतिमाएं और तालाबों के अवशेष इस प्राचीन नगरी की समृद्धि को दर्शाते हैं। इस स्थान पर कुल 147 तालाबों की उपस्थिति थी, हालांकि वर्तमान में सिर्फ 10-12 तालाब ही अस्तित्व में हैं।

मावली के बाद गंगेश्वरी माता की प्रतिष्ठा

जनजातीय आस्था में मावली के बाद बम्हनीकरीन/गंगेश्वरी को द्वितीय स्थान प्राप्त है। प्राचीन नारायणपुर की कुलदेवी के रूप में गंगेश्वरी माता को सम्मानित किया जाता है। इनकी पूजा में विशिष्ट आस्था है और इन्हें ‘दरसगुड़ीन माता’ या ‘दरसबिती माता’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि माता का प्रतीक सिर्फ डोली में ही होता है। बम्हनीकरीन/गंगेश्वरी माता के सम्मान में प्रतिवर्ष माता मेला का आयोजन किया जाता है।

देवजतरा की तैयारी

इस वर्ष बम्हनीकरीन/गंगेश्वरी माता का वार्षिक देवजतरा 24 मार्च को प्रारंभ हुआ था, और इसका समापन आज 26 मार्च को होगा। देवजतरा के आयोजन में क्षेत्र के लगभग 25 गांवों के देवी-देवता शामिल होते हैं। देव समिति इस दौरान गांवों में जाकर पूजन सामग्री लेकर देवी-देवताओं की सेवा-अर्चना करती है और उन्हें जतरा में आने का निमंत्रण देती है।

देवी-देवताओं का आगमन और स्वागत

जतरा की निर्धारित तिथि में देवी-देवताओं के आगमन के बाद गांव की महिलाएं और बुजुर्ग उनका स्वागत करते हैं और विश्राम के लिए निर्धारित आसन पर उन्हें बैठाया जाता है। देवी-देवताओं के एकत्र होने के बाद देवकोठार को ‘कीली खुट्टी’ (लौहमल का चूर्ण) से बंधन में बांध दिया जाता है ताकि कोई अशुभ शक्ति देवकोठार में प्रवेश न कर सके और कार्यक्रम निर्विघ्न संपन्न हो सके।

जतरा की विशिष्ट परंपराएं

जतरा के दूसरे दिन, सुबह के समय देवी-देवता नृत्य करते हैं और युवा समूह उन्हें नाचने, कूदने और परिक्रमा करने के लिए प्रेरित करते हैं। सूर्योदय के बाद, देवी-देवता ‘रचन खेलने’ के लिए गांवों में निकलते हैं और घर-घर जाकर हल्दी पानी का घोल, तेल, चावल, पुष्प और लाली अर्पित करते हैं। साथ ही, देशी शराब (मंद) भी अर्पित की जाती है। रचन झोंकने का अर्थ है कि गांव के प्रत्येक घर की सुरक्षा की जिम्मेदारी देवी-देवता अपने ऊपर लेते हैं।

समापन और विदाई

जतरा के समापन के तीसरे दिन देवी-देवताओं को होम आहार अर्पित किया जाता है और फिर सेवा अर्जी के बाद उन्हें विदाई दी जाती है। इस दिन के बाद सभी देवी-देवताओं को विशेष रूप से सम्मानित किया जाता है और यह कार्यक्रम आदिवासी समाज की गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रतीक बन जाता है।

निष्कर्ष

बम्हनीकरीन/गंगेश्वरी माता का वार्षिक देवजतरा आदिवासी समुदाय की परंपरा, आस्था और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह आयोजन न केवल क्षेत्रीय देवी-देवताओं के सम्मान में होता है, बल्कि समाज के सभी वर्गों को एकजुट करने का भी कार्य करता है। इस उत्सव के माध्यम से लोग अपने देवी-देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और पूरे समुदाय में भक्ति और प्रेम का वातावरण बनता है।

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