नारायणपुर में गाजर घास पर जैविक वार, मैक्सिकन बीटल बना कारगर हथियार
लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय की पहल रंग लाई, कई गांवों में छोड़े गए बीटल से खरपतवार पर लगाम

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। जिले में तेजी से फैल रही खतरनाक खरपतवार गाजर घास के खिलाफ शुरू किया गया जैविक अभियान अब असर दिखाने लगा है। लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय द्वारा मैक्सिकन बीटल के माध्यम से किए गए प्रयोग से जिले के कई गांवों में गाजर घास की वृद्धि में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
महाविद्यालय द्वारा करीब 25 माह पहले तैयार किए गए लगभग 2500 मैक्सिकन बीटल को बिंजली, पालकी, खड़कागांव, खेराभाट तथा लारिसर स्थित कॉलेज परिसर सहित विभिन्न क्षेत्रों में छोड़ा गया था। अब इन सभी स्थानों पर बीटल न केवल स्थापित हो चुके हैं, बल्कि तेजी से गाजर घास को नियंत्रित भी कर रहे हैं।

इस पहल की नींव विशेषज्ञ मार्गदर्शन और वैज्ञानिक योजना के साथ रखी गई थी। सामाजिक कार्यकर्ता एवं कृषि विशेषज्ञ डॉ. रत्ना नाशिने ने रायपुर स्थित बायोकंट्रोल लैब की प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. जया गांगुली से विचार-विमर्श कर बीटल्स की उपलब्धता सुनिश्चित की। इसके बाद इन्हें नारायणपुर लाकर चरणबद्ध तरीके से विभिन्न क्षेत्रों में छोड़ा गया।
इस अभियान में महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एनएसएस एवं आरएडब्ल्यूई कार्यक्रम के तहत विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी से बीटल्स का वितरण और स्थानीय स्तर पर प्रजनन कराया गया, जिससे इनकी संख्या में लगातार वृद्धि हुई और प्रभाव क्षेत्र का विस्तार संभव हो सका।

डॉ. नाशिने के अनुसार मैक्सिकन बीटल गाजर घास की पत्तियों और कोमल भागों को खाकर पौधे को कमजोर कर देता है। इससे खरपतवार का विकास रुक जाता है और धीरे-धीरे इसका प्रसार नियंत्रित हो जाता है। अब यह बीटल प्राकृतिक रूप से स्थापित हो चुका है, जिससे लंबे समय तक नियंत्रण संभव रहेगा।
विशेषज्ञ बताते हैं कि गाजर घास एक अत्यंत आक्रामक खरपतवार है, जो कृषि भूमि, सड़क किनारों और खुले स्थानों में तेजी से फैलती है। यह मनुष्यों और पशुओं में एलर्जी, त्वचा रोग तथा श्वसन संबंधी समस्याओं का कारण भी बनती है। ऐसे में इसका जैविक नियंत्रण न केवल प्रभावी बल्कि पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित विकल्प साबित हो रहा है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय का यह प्रयास अब एक सफल मॉडल के रूप में उभर रहा है, जिसे अन्य जिलों में अपनाकर गाजर घास की समस्या से प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है।




