नारायणपुर

दुर्गम अबूझमाड़ में जीवन की जंग: ITBP जवान बने देवदूत

5 किमी जंगल-पहाड़ पार कर गर्भवती महिला को बचाया, मां-बच्चा दोनों सुरक्षित

(कैलाश सोनी) नारायणपुर, 28 मार्च 2026।

अबूझमाड़… जहां आज भी जीवन आसान नहीं, बल्कि हर दिन एक संघर्ष है। घने जंगल, ऊबड़-खाबड़ पहाड़, सड़क और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव—यहां की नियति रही है। कभी नक्सलवाद की काली छाया में सिमटा यह इलाका आज धीरे-धीरे बदल रहा है। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह बनी है—सुरक्षा बलों की बढ़ती मौजूदगी और उनकी मानवीय पहल।

इसी बदलाव की जीवंत तस्वीर उस वक्त सामने आई, जब इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान के सुदूर ग्राम बोटेर (Boter) से एक गर्भवती महिला की जान बचाने के लिए ITBP जवानों ने जान की बाजी लगाकर 5 किलोमीटर तक दुर्गम जंगल-पहाड़ पार किया।

यह सिर्फ एक रेस्क्यू नहीं था, बल्कि अबूझमाड़ में भरोसे और बदलाव की एक मजबूत कहानी भी है।


जंगल से अस्पताल तक… संघर्ष की असली कहानी

27 मार्च 2026 की सुबह, नारायणपुर जिले के अतिसंवेदनशील क्षेत्र से सूचना मिली कि ग्राम बोटेर की एक गर्भवती महिला की हालत गंभीर है। गांव में न सड़क, न अस्पताल और न ही त्वरित चिकित्सा सुविधा। ऐसे में हर मिनट की देरी जानलेवा साबित हो सकती थी।

सूचना मिलते ही ITBP की 29वीं बटालियन हरकत में आई। कमांडेंट के निर्देशन में सहायक कमांडेंट अनिल कुमार के नेतृत्व में एक त्वरित कार्रवाई दल (QRT) तुरंत रवाना किया गया।

जंगलों से घिरे इस क्षेत्र में कोई सीधा रास्ता नहीं था। जवानों को पगडंडियों, पत्थरीले ढलानों और खतरनाक चढ़ाइयों से होकर गुजरना पड़ा।


जब रास्ता नहीं मिला… तो खुद बनाया स्ट्रेचर

गांव पहुंचने पर स्थिति और भी गंभीर थी। महिला चलने की स्थिति में नहीं थी। ऐसे में जवानों ने स्थानीय संसाधनों की मदद से तत्काल एक अस्थायी स्ट्रेचर तैयार किया।

फिर शुरू हुआ असली संघर्ष—
करीब 5 किलोमीटर तक पैदल सफर,
कंधों पर जिंदगी का भार,
और सामने जंगल-पहाड़ की कठिन चुनौती।

फोटोज में साफ दिखता है कि कैसे जवानों ने बारी-बारी से स्ट्रेचर उठाया, पसीना बहाया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी।


ऊबड़-खाबड़ रास्ते, खतरों के बीच मानवता की मिसाल

रेस्क्यू के दौरान टीम को कई बाधाओं का सामना करना पड़ा—

  • संकरे और फिसलन भरे रास्ते
  • सूखे जंगलों में जोखिम
  • चढ़ाई और उतराई का लगातार दबाव

लेकिन जवानों के चेहरे पर थकान से ज्यादा जिम्मेदारी का भाव नजर आया।

एक फोटो में जवान गर्भवती महिला को लेकर जंगल से बाहर निकलते दिखाई देते हैं, तो दूसरी तस्वीर में उन्हें एंबुलेंस तक पहुंचाते हुए देखा जा सकता है।


समय पर पहुंची एंबुलेंस, बची दो जिंदगियां

रेस्क्यू टीम महिला को बोटेर और कुदमेल के बीच निर्धारित प्वाइंट तक लेकर पहुंची, जहां पहले से एंबुलेंस तैयार खड़ी थी।

इसके बाद महिला को तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC), ओरछा पहुंचाया गया।
डॉक्टरों की देखरेख में इलाज शुरू हुआ और राहत की खबर आई—
मां और शिशु दोनों सुरक्षित हैं।


अबूझमाड़: संघर्ष, बदलाव और उम्मीद की कहानी

अबूझमाड़ लंबे समय तक देश के सबसे दुर्गम और उपेक्षित इलाकों में गिना जाता रहा है।

  • सड़कें नहीं
  • स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित
  • शिक्षा और विकास से दूरी
  • और ऊपर से नक्सलवाद का प्रभाव

यहां के लोग वर्षों तक भय और अभाव के बीच जीते रहे।

लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।


सुरक्षा बल: सिर्फ सुरक्षा नहीं, जीवन का सहारा

पहले जहां सुरक्षा बलों को केवल सुरक्षा तक सीमित समझा जाता था, वहीं अब वे ग्रामीणों के लिए जीवन रक्षक बनकर उभरे हैं।

  • बीमारों को अस्पताल पहुंचाना
  • गांवों में चिकित्सा शिविर लगाना
  • आपात स्थिति में तुरंत मदद

इस घटना ने यह साबित कर दिया कि सुरक्षा बल अबूझमाड़ के लोगों के लिए वरदान बन चुके हैं।


ग्रामीणों में बढ़ा भरोसा

इस रेस्क्यू के बाद स्थानीय ग्रामीणों में सुरक्षा बलों के प्रति विश्वास और मजबूत हुआ है।

गांव की महिलाओं और बुजुर्गों ने राहत की सांस ली।
एक तस्वीर में ग्रामीण परिवार की चिंता और जवानों की तत्परता साफ झलकती है।


तस्वीरों में दिखी संवेदनशीलता और साहस

इस पूरे अभियान की तस्वीरें खुद कहानी बयां करती हैं—

  • जंगल के बीच स्ट्रेचर लेकर चलते जवान
  • एंबुलेंस तक पहुंचाने की जद्दोजहद
  • गांव में मरीज की हालत का आकलन
  • ग्रामीणों और जवानों के बीच तालमेल

हर तस्वीर में एक संदेश है—
“जहां सड़क नहीं, वहां भी उम्मीद पहुंच रही है।”


मानवीय संवेदनशीलता की मिसाल

यह अभियान केवल एक ऑपरेशन नहीं था, बल्कि कर्तव्य, संवेदनशीलता और समर्पण का संगम था।

ITBP और नारायणपुर पुलिस ने यह दिखा दिया कि
“वर्दी सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि सेवा का प्रतीक भी है।”


बदलते अबूझमाड़ की तस्वीर

आज अबूझमाड़ में—

  • सुरक्षा कैंप स्थापित हो रहे हैं
  • स्वास्थ्य सेवाएं धीरे-धीरे पहुंच रही हैं
  • प्रशासन की पकड़ मजबूत हो रही है

और सबसे बड़ी बात—
लोगों के दिलों में डर की जगह भरोसा बढ़ रहा है।


उम्मीद की राह पर अबूझमाड़

इंद्रावती के जंगलों में हुआ यह रेस्क्यू सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस बदलाव की कहानी है जो अबूझमाड़ में दस्तक दे रहा है।

जहां कभी सन्नाटा और डर था, वहां अब जीवन बचाने की दौड़ है।
जहां रास्ते नहीं थे, वहां अब मदद पहुंच रही है।

और इस बदलाव के केंद्र में हैं—
हमारे सुरक्षा बल, जो हर परिस्थिति में मानवता का साथ निभा रहे हैं।

अबूझमाड़ लाइव न्यूज़

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