नारायणपुर

अबूझमाड़ के जंगलों को आग से बचाने उतरा वन विभाग, लोककला मंच के जरिए ग्रामीणों को किया जागरूक

महुआ व साल बीज संग्रहण के दौरान लगती आग से वन संपदा और वन्यजीवों को खतरा, ग्रामीणों ने ली जंगल बचाने की शपथ

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। करीब 4400 वर्ग किलोमीटर में फैले अबूझमाड़ के घने वन क्षेत्र में इन दिनों महुआ के फूल और साल बीज झड़ने का मौसम शुरू हो गया है। इस दौरान ग्रामीण महुआ और साल बीज एकत्रित कर बाजारों में बेचकर अपनी आजीविका चलाते हैं। लेकिन पेड़ों के नीचे गिरे सूखे पत्तों को हटाने के लिए कई बार ग्रामीण आग लगा देते हैं, जिससे जंगलों में आग फैलने का खतरा बढ़ जाता है। इसी खतरे को देखते हुए वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, नारायणपुर वन मंडल ने ग्रामीणों के बीच व्यापक जनजागरूकता अभियान शुरू किया है।

नारायणपुर वन मंडल के अंतर्गत अबूझमाड़ क्षेत्र के पश्चिम सोनपुर वन परिक्षेत्र में ग्राम पंचायत कोंगे, बैरेन टोला और पांगुड़ में लोककला मंच के माध्यम से विशेष जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम वन मंडलाधिकारी वेंकटेश एम. जी. के मार्गदर्शन में आयोजित हुआ, जिसमें ग्रामीणों को वनों में लगने वाली आग के दुष्परिणामों के बारे में विस्तार से बताया गया।

कार्यक्रम में लोक कलाकारों ने नृत्य, गीत और नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से समझाया कि जंगल में लगने वाली आग से न केवल बड़े पेड़ बल्कि छोटे औषधीय पौधे भी नष्ट हो जाते हैं। आग के कारण हर साल उगने वाले नए पौधे जल जाते हैं, सूखे पत्ते जो प्राकृतिक खाद बनते हैं वह खत्म हो जाते हैं, पक्षियों के घोंसले नष्ट हो जाते हैं और कई बार वन्य प्राणियों की अकाल मृत्यु भी हो जाती है। इसके अलावा जंगलों में आग लगने से पर्यावरणीय संतुलन भी प्रभावित होता है और वर्षा पर भी इसका असर पड़ता है।

वन विभाग के अधिकारियों ने ग्रामीणों को बताया कि जंगलों में आग लगने के कई कारण होते हैं। इनमें महुआ संग्रहण के समय पेड़ों के नीचे आग लगाना, होली के दौरान आग जलाना, तेंदूपत्ता तोड़ने के लिए झाड़ियों को जलाना, साल बीज संग्रहण के दौरान आग लगाना, जलती बीड़ी-सिगरेट जंगल में फेंक देना जैसे कारण प्रमुख हैं। इन कारणों से हर साल बड़ी मात्रा में वन संपदा को नुकसान पहुंचता है।

कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों को यह भी समझाया गया कि यदि कहीं जंगल में आग लगती दिखाई दे तो उसे फैलने से पहले मिलकर बुझाने का प्रयास करें और तुरंत वन विभाग को सूचना दें। कार्यक्रम में उपस्थित वन विभाग के कर्मचारियों ने ग्रामीणों को जंगल की रक्षा करने और वनों में आग नहीं लगाने की शपथ भी दिलाई।

इस अवसर पर ग्राम पंचायत पांगुड़ की सरपंच धनाय उसेंडी और वरिष्ठ ग्रामीण कांदे राम ईसामी ने भी ग्रामीणों को संबोधित करते हुए जंगलों को आग से बचाने की अपील की। उन्होंने कहा कि जंगल ही इस क्षेत्र की जीवनरेखा है और इसके संरक्षण में हर ग्रामीण की महत्वपूर्ण भूमिका है। ग्रामीणों ने भी जंगल के विकास और सुरक्षा में लगातार सहयोग देने का भरोसा जताया।

कार्यक्रम में वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों के साथ अग्नि रोकथाम कंट्रोल रूम के नोडल अधिकारी, संयुक्त वन प्रबंधन समिति के सदस्य, अग्नि प्रहरी और बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। ग्राम पंचायत कोंगे के कटिया राम ध्रुव, बल्दू राम गोटा, माहुरु राम ध्रुव, दासु नूरेटी, वक्के इसामी, मनकू नूरेटी, सुकलू कचलामी, कठिया नुरेटी, समरी ध्रुव, रमी नूरेठी, जानको नुरेटी, ममता, सीता ध्रुव, कमला नुरेटी सहित कई ग्रामीण शामिल हुए। वहीं ग्राम पंचायत पांगुड़ से दसरू राम उसेंडी, मेरिया पट्टावी, लिंगों मट्टामी, वार्ड पंच सुकलू मंडावी, चमरी मेट्टामी, सुमित्रा मंडावी, सेते उसेंडी, जुल्ले बाई, पांडरी मंडावी सहित बड़ी संख्या में नवयुवक और महिलाएं मौजूद थीं।

वन विभाग का मानना है कि यदि ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी मिले तो अबूझमाड़ के विशाल जंगलों को आग से बचाना संभव है, जिससे न केवल वन संपदा सुरक्षित रहेगी बल्कि वन्यजीवों और पर्यावरण का संतुलन भी बना रहेगा।

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