नारायणपुर

बस्तर के इतिहास में पहली बार स्कूली बच्चों को मिला ‘फ्लाइंग एक्सपोजर’, नारायणपुर की छात्रा का सवाल बना हौसलों की उड़ान

✈️ “सर, मैं फाइटर पायलट कैसे बन सकती हूँ?”

जगदलपुर एयरपोर्ट पर कॉकपिट तक पहुंचे सपने, विंग कमांडर से मिली दिशा

कैलाश सोनी- नारायणपुर। “सर, मैं फाइटर पायलट कैसे बन सकती हूँ?”—नारायणपुर के सुदूर अंचल से पहुंची एक छात्रा का यह सवाल शनिवार को जगदलपुर के माँ दंतेश्वरी हवाई अड्डे पर गूंजा तो वहां मौजूद हर शख्स पल भर को ठिठक गया। यह महज एक सवाल नहीं था, बल्कि बस्तर के आदिवासी अंचल से उठती आकांक्षाओं की आवाज थी—वह आवाज, जो वर्षों तक सीमित संसाधनों और अवसरों की कमी के कारण दब जाती थी। जिला प्रशासन की पहल पर आयोजित इस शैक्षणिक भ्रमण ने बच्चों के सपनों को पहली बार रनवे पर उतरते देखा।

बस्तर के इतिहास में संभवतः यह पहला अवसर रहा, जब सामान्य स्कूली विद्यार्थियों को एनसीसी एयर कैडेट्स की तर्ज पर व्यावहारिक ‘फ्लाइंग एक्सपोजर’ दिया गया। उद्देश्य साफ था—बच्चों को विमानन तकनीक, वायुसेना की कार्यप्रणाली और रक्षा सेवाओं में करियर की वास्तविक संभावनाओं से रूबरू कराना, ताकि उनके सपनों को दिशा मिल सके।

कॉकपिट में बैठे सपने, आसमान को छूती आंखें

बालक बुनियादी मिडिल स्कूल, गरांजी और जवाहर नवोदय विद्यालय के कुल 45 छात्र-छात्राओं ने हवाई अड्डे पर तैनात माइक्रोलाइट एयरक्राफ्ट का तकनीकी अवलोकन किया। विद्यार्थियों के लिए यह अनुभव किसी पाठ्यपुस्तक से कहीं आगे का था—जब वे स्वयं कॉकपिट में बैठे, कंट्रोल पैनल को छुआ और उपकरणों को नजदीक से देखा।
विंग कमांडर विवेक कुमार साहू और उनकी तकनीकी टीम ने ‘बेसिक प्रिंसिपल्स ऑफ फ्लाइंग’ पर विशेष सत्र में वायुगतिकी, इंजन की शक्ति और नियंत्रण प्रणालियों को सरल भाषा में समझाया। बच्चों की आंखों में कौतूहल के साथ आत्मविश्वास झलक रहा था—जैसे आसमान अब दूर नहीं, बल्कि पहुंच में हो।

फाइटर पायलट बनने की राह: अनुशासन, विज्ञान और संकल्प

छात्रा के सवाल के जवाब में विंग कमांडर विवेक साहू ने फाइटर पायलट बनने की प्रक्रिया को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि मजबूत शारीरिक फिटनेस के साथ विज्ञान विषयों में गहरी रुचि, अनुशासन और निरंतर अभ्यास अनिवार्य है। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) से लेकर वायुसेना अकादमी तक की यात्रा, मेडिकल फिटनेस और कठिन प्रशिक्षण चरणों की जानकारी सुनकर बच्चों के चेहरे पर आश्चर्य और उत्साह दोनों साफ दिखे।
यह संवाद बच्चों के भीतर छुपी आकांक्षाओं को शब्द दे रहा था—अब वे केवल ‘पायलट’ नहीं, बल्कि ‘फाइटर पायलट’ बनने का सपना देखने लगे थे।

प्रशासन की पहल: अवसरों तक पहुंच की नई खिड़की

जिला शिक्षा अधिकारी अशोक पटेल के मार्गदर्शन में आयोजित इस भ्रमण में एयरपोर्ट प्रबंधन और सुरक्षा अधिकारियों का विशेष सहयोग रहा। कार्यक्रम के समापन पर आयोजित प्रश्नोत्तरी में विमानन और रक्षा तकनीक से जुड़े सवालों के सही जवाब देने वाले मेधावी छात्रों को पुरस्कृत किया गया।
जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के इस संयुक्त प्रयास ने यह संदेश दिया कि दूरस्थ अंचलों के बच्चों को भी उच्च स्तरीय एक्सपोजर मिलना चाहिए। यह पहल केवल एक भ्रमण नहीं, बल्कि शिक्षा को अनुभव से जोड़ने की दूरदर्शी सोच का प्रतीक है।

‘दिल्ली दूर नहीं’—अब बस्तर के लिए भी सच

पूर्व में गरांजी विद्यालय में फाइटर पायलट विवेक साहू के प्रेरक संवाद और एयरपोर्ट भ्रमण की घोषणा ने नारायणपुर के बच्चों में जो ऊर्जा भरी थी, यह भ्रमण उसी पहल का सशक्त विस्तार बनकर सामने आया। अब बस्तर के बच्चों के लिए “दिल्ली दूर नहीं” की कहावत महज मुहावरा नहीं रही—वे राष्ट्रीय मंच पर खुद को देखने लगे हैं।
जहां एक समय बच्चों के सपने सीमित अवसरों में सिमट जाते थे, वहीं अब वे रक्षा सेवाओं, विमानन और तकनीकी क्षेत्रों में करियर की ठोस योजना बनाने लगे हैं।

फ्रंट पेज की कहानी: बस्तर के सपनों को मिले पंख

यह आयोजन बस्तर के शिक्षा परिदृश्य में मील का पत्थर है। सामान्य स्कूली बच्चों को एनसीसी एयर कैडेट्स जैसी सुविधा देकर जिला प्रशासन ने यह साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी भूगोल की मोहताज नहीं होती—उसे बस सही मंच और मार्गदर्शन चाहिए।
नारायणपुर की छात्रा का वह सवाल—“सर, मैं फाइटर पायलट कैसे बन सकती हूँ?”—आज पूरे बस्तर के बच्चों की आकांक्षा बन चुका है। यह सवाल बताता है कि अब इस अंचल के सपने भी ऊंची उड़ान भरने को तैयार हैं।

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