बंदूक से “बॉर्डर 2” तक: देशभक्ति की स्क्रीन पर बदली विचारधारा
पुनर्वास केंद्र में फिल्मों से आत्मसमर्पित माओवादियों के भीतर जगी नई सुबह

हर बुधवार देशभक्ति फिल्मों की स्क्रीनिंग, ‘बॉर्डर 2’ ने भरा जोश
नारायणपुर में कलेक्टर नम्रता जैन की पहल बनी बदलाव की मिसाल
कैलाश सोनी-नारायणपुर। नक्सलवाद की घनी छाया में वर्षों तक जंगलों की खाक छानने वाले, हथियारों के साए में जिंदगी गुजारने वाले आत्मसमर्पित माओवादियों के जीवन में अब बदलाव की नई किरण फूट पड़ी है। बंदूक की भाषा से दूर, संवाद और संवेदना के रास्ते पर चलने की यह यात्रा अब सिनेमा के परदे से होकर गुजर रही है। नारायणपुर के पुनर्वास केंद्र में शुरू हुई देशभक्ति और प्रेरक फिल्मों की नियमित स्क्रीनिंग केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि टूटे भरोसे को जोड़ने, भ्रमित विचारधाराओं को नई दिशा देने और समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन रही है।

राज्य सरकार की पुनर्वास नीति के तहत जिला प्रशासन द्वारा आत्मसमर्पित माओवादियों के पुनर्समाजिकीकरण के लिए चलाए जा रहे बहुआयामी प्रयासों में यह पहल एक निर्णायक मोड़ के रूप में उभर रही है। कलेक्टर नम्रता जैन के निर्देश पर अब हर बुधवार पुनर्वास केंद्र में सामूहिक रूप से देशभक्ति, सामाजिक चेतना और जीवन मूल्यों पर आधारित फिल्मों का प्रदर्शन किया जा रहा है। उद्देश्य स्पष्ट है—जिन हाथों ने कभी हिंसा का रास्ता चुना, वे अब देश और समाज के निर्माण में अपनी भूमिका पहचानें।

जंगलों की दुनिया से सिनेमा के उजाले तक
अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाकों में सक्रिय रहे अनेक आत्मसमर्पित माओवादी वर्षों तक बाहरी दुनिया से कटे रहे। आधुनिक जीवन, शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली, राष्ट्र की अवधारणा और लोकतांत्रिक मूल्यों से उनका संपर्क बेहद सीमित रहा। ऐसे में पुनर्वास केंद्र में फिल्म प्रदर्शन उनके लिए एक खिड़की बनकर खुला है, जहां से वे देश की विविधता, सेना का पराक्रम, नागरिकों का संघर्ष और राष्ट्रनिर्माण की व्यापक तस्वीर देख पा रहे हैं।
हाल ही में प्रदर्शित फिल्म ‘बॉर्डर 2’ ने इस पहल को भावनात्मक गहराई दी। परदे पर सीमा की रक्षा करते जवानों का साहस, देश के लिए बलिदान की भावना और साथियों के प्रति प्रतिबद्धता ने दर्शकों को भीतर तक झकझोर दिया। कई आत्मसमर्पित युवाओं की आंखों में पहली बार देश के प्रति गर्व की चमक दिखी। वर्षों से मन में बैठी शंकाओं और भ्रामक प्रचार के बीच राष्ट्रप्रेम का यह अनुभव उनके लिए नया था।
कलेक्टर की सोच, प्रशासन की संवेदना
कलेक्टर नम्रता जैन का मानना है कि पुनर्वास केवल आर्थिक सहायता या प्रशिक्षण तक सीमित नहीं होना चाहिए। विचारों का पुनर्निर्माण, भावनात्मक उपचार और सकारात्मक प्रेरणा भी उतनी ही जरूरी है। इसी सोच के तहत पुनर्वास केंद्र में शिक्षा, कौशल विकास, मनोवैज्ञानिक परामर्श, खेल गतिविधियों के साथ अब सिनेमा को भी एक औजार के रूप में जोड़ा गया है।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, आने वाले समय में केवल देशभक्ति ही नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकार, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, संविधानिक मूल्यों और उद्यमिता पर आधारित फिल्मों का चयन किया जाएगा। इससे आत्मसमर्पित माओवादियों को समाज की जटिलताओं और अवसरों की व्यापक समझ मिलेगी।
बदली सोच, बदले सपने
फिल्म देखने के बाद आत्मसमर्पित माओवादियों से हुई बातचीत में बदलाव की झलक साफ दिखी। एक युवक ने कहा, “हमने जंगल में रहते हुए देश को सिर्फ एक विचार के रूप में सुना था। आज पहली बार समझ आया कि देश सिर्फ सत्ता नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों का सपना है।”
एक अन्य ने बताया कि सेना के जवानों के त्याग को देखकर मन में सम्मान पैदा हुआ है और अब वह भी अपने गांव लौटकर बच्चों को पढ़ाना चाहता है।
यह बदलाव केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं है। पुनर्वास केंद्र में चल रहे कौशल प्रशिक्षण—जैसे बढ़ईगीरी, सिलाई, मोबाइल रिपेयरिंग, कृषि आधारित कार्य—के प्रति भी अब इनकी रुचि बढ़ी है। फिल्मों के जरिए मिले आत्मविश्वास ने उन्हें यह एहसास दिलाया है कि समाज में उनकी भी जगह है और वे सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं।
पुनर्वास नीति का मानवीय चेहरा
छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति का उद्देश्य आत्मसमर्पित माओवादियों को केवल हिंसा से दूर करना नहीं, बल्कि उन्हें समाज का जिम्मेदार नागरिक बनाना है। प्रशासन की इस पहल से यह संदेश भी गया है कि राज्य कठोरता के साथ संवेदना को भी समान महत्व देता है।
नारायणपुर जैसे नक्सल प्रभावित जिले में जहां वर्षों तक भय और अविश्वास का माहौल रहा, वहां पुनर्वास केंद्र के भीतर तालियों की गूंज और परदे पर लहराता तिरंगा एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत है।
सुरक्षा से समाजीकरण तक की लंबी राह
विशेषज्ञों का मानना है कि उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी शांति केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई से नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्संयोजन से आती है। आत्मसमर्पित युवाओं को यदि सम्मानजनक अवसर, शिक्षा और सकारात्मक प्रेरणा मिले, तो वे हिंसा की राह पर लौटने के बजाय समाज के लिए संसाधन बन सकते हैं।
फिल्म स्क्रीनिंग जैसी पहल छोटे कदम प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन इनके प्रभाव दूरगामी होते हैं। यह पहल न केवल विचारधारा में बदलाव ला रही है, बल्कि आत्मसमर्पित माओवादियों के भीतर आत्मगौरव और भविष्य के प्रति आशा का संचार भी कर रही है।
स्थानीय समाज का भरोसा
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्राम प्रतिनिधियों का कहना है कि पुनर्वास केंद्र में हो रहे इन प्रयासों से गांवों में भी भरोसा बढ़ रहा है। ग्रामीण अब आत्मसमर्पित युवाओं को संदेह की नजर से नहीं, बल्कि सुधार की राह पर चल रहे अपने ही लोगों के रूप में देखने लगे हैं। इससे सामाजिक स्वीकार्यता की प्रक्रिया तेज हो रही है, जो पुनर्वास की सफलता के लिए अहम है।
आगे की योजना
प्रशासन अब पुनर्वास केंद्र में पुस्तकालय, डिजिटल साक्षरता कक्ष और संवाद सत्रों की शुरुआत की योजना पर काम कर रहा है। फिल्मों के बाद सामूहिक चर्चा कराई जाएगी, ताकि देखी गई कहानियों से सीख लेकर जीवन में उतारा जा सके। मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों की मदद से परामर्श सत्र भी नियमित होंगे, जिससे हिंसा के अतीत से उबरने में मदद मिले।
एक नई पटकथा
नारायणपुर में शुरू हुई यह पहल केवल एक जिले की कहानी नहीं, बल्कि नक्सलवाद से जूझ रहे समूचे क्षेत्र के लिए एक मॉडल बन सकती है। जब जंगलों में भटकते कदम समाज की ओर मुड़ते हैं और परदे पर देशभक्ति की रोशनी भीतर तक उतरती है, तब समझ आता है कि बदलाव संभव है।
नक्सलवाद की अंधेरी गलियों से निकलकर राष्ट्रनिर्माण की रोशनी में कदम रखने की यह यात्रा आसान नहीं, लेकिन प्रशासन की संवेदनशील पहल और समाज के सहयोग से आत्मसमर्पित माओवादियों की जिंदगी में लिखी जा रही यह नई पटकथा आने वाले समय में शांति और विकास की मिसाल बन सकती है।




