नारायणपुर

कभी नक्सलवाद की ‘स्टेयरिंग’ संभालने वाले हाथों में अब विकास की गाड़ी, आत्मसमर्पित युवाओं को जिला प्रशासन ने दिखाई नई राह

बंदूक छोड़ अब थामेंगे स्टीयरिंग

कैलाश सोनी, नारायणपुर। कभी जिन हाथों में बंदूक थी, आज उन्हीं हाथों में स्टीयरिंग है। कभी जो युवा अबूझमाड़ के दुर्गम जंगलों में नक्सलवाद की काली छाया के बीच भटकाव की राह पर थे, आज वही भारत के राष्ट्रीय राजमार्गों पर आधुनिक वाहनों की स्टेयरिंग संभालने को तैयार हैं। यह बदलाव किसी चमत्कार से कम नहीं, बल्कि जिला प्रशासन की संवेदनशील नीति, सतत प्रयास और पुनर्वास की मजबूत रणनीति का परिणाम है। ‘बंदूक छोड़ अब थामेंगे स्टीयरिंग’—यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि अबूझमाड़ से लौटे युवाओं के जीवन में नई शुरुआत की घोषणा है।

अबूझमाड़: जहां कभी सड़कें नहीं थीं, आज सपनों की राहें बन रही हैं

नारायणपुर जिले का अबूझमाड़ इलाका वर्षों तक नक्सलवाद की ‘रेड कॉरिडोर’ पहचान से जुड़ा रहा। घने जंगल, दुर्गम पहाड़ियां और विकास से कटा इलाका—यहां न सड़कें थीं, न संचार के साधन। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की कमी ने कई युवाओं को हिंसा के रास्ते पर धकेला। नक्सली संगठनों ने इन्हीं परिस्थितियों का लाभ उठाकर युवाओं को भटकाया।
लेकिन समय बदला है। सरकार की सड़क, संचार और सुरक्षा के मोर्चे पर की गई पहल से अबूझमाड़ की तस्वीर बदल रही है। जहां कभी रास्ते नहीं थे, वहां अब सड़कों का जाल बिछ रहा है। और जहां कभी बंदूकें बोलती थीं, वहां अब रोजगार, कौशल और आत्मनिर्भरता की भाषा सुनाई दे रही है।

आत्मसमर्पित युवाओं के लिए नई शुरुआत

21 फरवरी 2026 को नारायणपुर जिले में शांति, पुनर्वास और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल हुई। कलेक्टर नम्रता जैन के मार्गदर्शन में जिला परियोजना लाइवलीहुड कॉलेज के पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पित युवाओं के लिए टैक्सी ड्राइवर (व्यावसायिक वाहन चालक) प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य सिर्फ रोजगार देना नहीं, बल्कि युवाओं को समाज की मुख्यधारा से सम्मान के साथ जोड़ना है। प्रशासन मानता है कि जब तक आत्मसमर्पित युवाओं को स्थायी आजीविका, सामाजिक स्वीकार्यता और आत्मसम्मान नहीं मिलेगा, तब तक पुनर्वास अधूरा रहेगा।

व्यावहारिक प्रशिक्षण: आत्मविश्वास की नई चाबी

प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरी तरह प्रायोगिक है। युवाओं को सुरक्षित और अनुशासित वाहन संचालन, यातायात नियमों, सड़क सुरक्षा मानकों की विस्तृत जानकारी दी जा रही है। इसके साथ ही व्यावसायिक ड्राइविंग व्यवहार, ग्राहक सेवा कौशल और वाहन के प्राथमिक तकनीकी रखरखाव का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।
आपातकालीन परिस्थितियों में जिम्मेदार ड्राइविंग कैसे की जाए—इस पर विशेष फोकस है। प्रशिक्षकों का मानना है कि केवल गाड़ी चलाना सिखा देना पर्याप्त नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक और पेशेवर चालक के रूप में तैयार करना जरूरी है।

रोजगार से जोड़ने की ठोस कार्ययोजना

प्रशिक्षण के बाद युवाओं को टैक्सी संचालन, निजी वाहन चालक, ट्रैवल एजेंसी और परिवहन क्षेत्र में रोजगार से जोड़ने के लिए जिला प्रशासन ने ठोस योजना बनाई है। प्रशिक्षण पूर्ण होते ही युवाओं को त्वरित रोजगार या स्वरोजगार उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
कार्यक्रम का संचालन अधिकृत प्रशिक्षण भागीदार ‘ट्रू-वे एजुकेशन सेंटर, नारायणपुर’ द्वारा अनुभवी प्रशिक्षकों के माध्यम से किया जा रहा है। प्रशासन का प्रयास है कि प्रशिक्षित युवा सिर्फ नौकरी तलाशने वाले नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर उद्यमी बनें।

काली छाया से उजाले की ओर: बदलती मानसिकता

यह पहल सिर्फ कौशल प्रशिक्षण नहीं, बल्कि मानसिक बदलाव की प्रक्रिया भी है। जो युवा कभी हिंसा के रास्ते पर थे, आज वे समाज में सम्मानजनक पहचान बनाने का सपना देख रहे हैं। प्रशिक्षण के दौरान कई युवाओं ने स्वीकार किया कि उन्हें पहली बार लगा है कि सरकार उन पर भरोसा कर रही है।
एक आत्मसमर्पित युवा ने कहा, “पहले हमें जंगलों में भटकना पड़ता था, आज हम सड़क पर आगे बढ़ने की सोच रहे हैं। यह बदलाव हमारे लिए नई जिंदगी जैसा है।” यह बयान सिर्फ एक व्यक्ति की भावना नहीं, बल्कि पूरे अबूझमाड़ में बदलते माहौल का संकेत है।

प्रशासन की रणनीति: सुरक्षा के साथ संवेदनशीलता

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शांति बहाली का रास्ता केवल सुरक्षा कार्रवाई से नहीं निकलता। जिला प्रशासन ने समझा कि पुनर्वास, कौशल विकास और रोजगार ही स्थायी समाधान हैं। सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ आत्मसमर्पित युवाओं के लिए विशेष कार्यक्रम चलाकर प्रशासन ने भरोसे की एक नई डोर बांधी है।
कलेक्टर नम्रता जैन का मानना है कि जब युवा सम्मानजनक रोजगार से जुड़ते हैं, तो वे हिंसा के रास्ते पर लौटने की बजाय समाज के निर्माण में भागीदार बनते हैं। यही सोच इस कार्यक्रम की आत्मा है।

राष्ट्रीय राजमार्गों तक पहुंचेगी अबूझमाड़ की कहानी

यह प्रतीकात्मक परिवर्तन भी है—जहां कभी अबूझमाड़ में सड़कें नहीं थीं, वहां से निकले युवा अब राष्ट्रीय राजमार्गों पर गाड़ियां चलाएंगे। यह केवल भौतिक यात्रा नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक यात्रा भी है—हिंसा से विकास की ओर, भय से भरोसे की ओर।
सरकार के प्रयासों से जो युवा कभी नक्सली संगठनों की ‘स्टेयरिंग’ संभाल रहे थे, आज वे देश की विकास गाड़ी को आगे बढ़ाने का हिस्सा बनेंगे। यह परिवर्तन नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में सबसे मजबूत जवाब है।

युवाओं के लिए संदेश: भविष्य बंदूक में नहीं, हुनर में है

‘बंदूक छोड़ अब थामेंगे स्टीयरिंग’ अभियान उन युवाओं के लिए प्रेरक संदेश है जो आज भी भ्रम और भय के बीच फंसे हैं। यह कार्यक्रम बताता है कि सरकार का रास्ता खुला है, अवसर मौजूद हैं और समाज लौटे हुए युवाओं को स्वीकार करने के लिए तैयार है।
प्रशासन का मानना है कि जैसे-जैसे और युवा इस तरह के कार्यक्रमों से जुड़ेंगे, वैसे-वैसे अबूझमाड़ की पहचान पूरी तरह बदलेगी—रेड कॉरिडोर से रिहैबिलिटेशन कॉरिडोर की ओर।

नई इबारत की शुरुआत

अबूझमाड़ की धरती पर लिखी जा रही यह नई इबारत सिर्फ कुछ युवाओं की कहानी नहीं, बल्कि पूरे अंचल के भविष्य की दिशा है। सड़कें बन रही हैं, स्कूल खुल रहे हैं, रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं और बंदूकें धीरे-धीरे हुनर में बदल रही हैं।
यह खबर प्रेरणा देती है कि हिंसा के अंधेरे से निकलकर उजाले की राह पर चला जा सकता है—बस जरूरत है सही दिशा, संवेदनशील नीति और समाज के भरोसे की।
नारायणपुर जिला प्रशासन की यह पहल नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए मॉडल बन सकती है—जहां पुनर्वास सिर्फ कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई दे रहा है।

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