अबूझमाड़ का लाल: रेड कॉरिडोर से सिनेमा की रोशनी तक

नक्सल हिंसा की छाया से निकलकर निर्देशक बना अबूझमाड़ का बेटा, 6 मार्च को रिलीज होगी छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘मुरली’
कैलाश सोनी, नारायणपुर। कभी “रेड कॉरिडोर” के नाम से देश-दुनिया में पहचाने जाने वाले अबूझमाड़ की पहचान अब धीरे-धीरे बदल रही है। संघर्ष, अभाव और नक्सलवाद की काली छाया के बीच पले-बढ़े इस अंचल के युवा अब खेल, कला और सृजन के जरिए नई इबारत लिख रहे हैं। इसी बदलाव की जीवंत मिसाल बने हैं दिनेश नाग—अबूझमाड़ की धरती से उड़ान भरकर मुंबई की फिल्मी दुनिया तक पहुंचे युवा, जिन्होंने अब निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखते हुए छत्तीसगढ़ी सिनेमा को नई दिशा देने का बीड़ा उठाया है।

अबूझमाड़ से मुंबई तक: संघर्षों के बीच सपनों की उड़ान
नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले दिनेश नाग ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रामकृष्ण मिशन आश्रम, नारायणपुर में 12वीं तक पूरी की। इसके बाद रायपुर पहुंचकर पढ़ाई के साथ थिएटर जॉइन किया और अभिनय की बारीकियां सीखीं। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से जुड़े रंगकर्मियों के संपर्क में आकर उनके सपनों को नई दिशा मिली।
मुंबई तक का सफर आसान नहीं रहा—आर्थिक तंगी, अनिश्चित भविष्य और संघर्षों के बीच भी दिनेश ने हार नहीं मानी। उनका कहना है कि निरंतर मेहनत और लगन ही वह पूंजी है, जो कठिन रास्तों को भी आसान बना देती है।
बड़े मंच पर छोटे किरदार, बड़ा अनुभव
मुंबई में दिनेश को पहली बड़ी पहचान फिल्म Phas Gaye Re Obama से मिली। इसके बाद Jolly LLB 2 और Newton जैसी चर्चित फिल्मों में छोटे लेकिन महत्वपूर्ण किरदार निभाकर उन्होंने सिनेमा की व्यावसायिक बारीकियों को करीब से समझा। बड़े कलाकारों और निर्देशकों के साथ काम करने का अनुभव उनके लिए एक खुला पाठशाला साबित हुआ, जिसने उनके भीतर निर्देशक बनने का आत्मविश्वास पैदा किया।
‘मुरली’ के जरिए निर्देशन में नई शुरुआत
अब दिनेश नाग निर्देशन के मोर्चे पर हैं। उनकी छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘मुरली’ 6 मार्च को रिलीज होने जा रही है। दिनेश का दावा है कि यह फिल्म पारंपरिक छत्तीसगढ़ी सिनेमा से अलग विषयवस्तु, प्रस्तुति और तकनीकी दृष्टि के साथ दर्शकों को नया अनुभव देगी। वे कहते हैं कि क्षेत्रीय सिनेमा को नए आयाम देना और छत्तीसगढ़ की कहानियों को व्यापक मंच पर पहुंचाना उनका लक्ष्य है।
संघर्ष की धरती से संभावनाओं की पहचान
नक्सलवाद का दंश झेल चुके अबूझमाड़ ने समय के साथ खेल और कला के क्षेत्र में प्रतिभाएं दी हैं। फुटबॉल और मलखंभ जैसे खेलों में यहां के युवाओं ने अपनी पहचान बनाई है। अब उसी कड़ी में दिनेश नाग कला के माध्यम से अपने क्षेत्र की सकारात्मक छवि गढ़ रहे हैं। उनका सपना है कि आने वाले समय में वे अबूझमाड़ की संस्कृति, जीवनशैली और प्राकृतिक सौंदर्य पर आधारित एक फिल्म बनाएं, ताकि दुनिया इस अंचल को संघर्ष नहीं, संभावनाओं की धरती के रूप में देखे।
युवाओं के लिए उम्मीद की किरण
दिनेश नाग की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं। उनका सफर बताता है कि दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास से रास्ते खुद बनते हैं।
अबूझमाड़—जो कभी भय और हिंसा की छाया में सिमटा माना जाता था—आज अपने खिलाड़ियों, कलाकारों और युवाओं की उपलब्धियों से नई पहचान गढ़ रहा है। 6 मार्च को रिलीज हो रही ‘मुरली’ के साथ अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि अबूझमाड़ का यह लाल छत्तीसगढ़ी सिनेमा में कैसी नई रोशनी बिखेरता है।




