नक्सल अंधकार से विकास की रोशनी तक अबूझमाड़
जहाँ कभी सरकार की पहुंच भी सपना थी, वहां आज कलेक्टर ने परखी योजनाओं की हकीकत

नारायणपुर। कभी नक्सलवाद की काली छाया में कैद, सड़क, स्कूल और अस्पताल से कोसों दूर अबूझमाड़ का सुदूर अंचल अब बदलाव की दहलीज पर खड़ा है। जिन इलाकों तक पहुंचना प्रशासन के लिए भी असंभव माना जाता था, वहां अब सरकार की योजनाएं जमीन पर उतरती दिख रही हैं। दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, सुरक्षा बलों की सतत कार्रवाई और प्रशासनिक संकल्प ने इस दुर्गम भूभाग की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है।
इसी क्रम में नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने बुधवार को अबूझमाड़ के सुदूर और अंतिम गांवों—गारपा, पांगुड़, कोंगे और सितरम—का सघन दौरा कर सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और बुनियादी सुविधाओं की वास्तविक स्थिति को परखा। यह दौरा सिर्फ औपचारिक निरीक्षण नहीं, बल्कि उस भरोसे की पड़ताल था, जिसे सरकार इन अंचलों के ग्रामीणों तक पहुंचाना चाहती है।

अंतिम गांव सितरम तक प्रशासन की दस्तक
70 किलोमीटर दुर्गम मार्ग का स्वयं किया निरीक्षण
अबूझमाड़ का अंतिम गांव सितरम—जहां तक पहुंचना कभी खतरे से खाली नहीं था—आज विकास की राह पर कदम बढ़ा रहा है। कलेक्टर नम्रता जैन ने सोनपुर से सितरम तक लगभग 70 किलोमीटर लंबे निर्माणाधीन सड़क मार्ग का निरीक्षण किया। इस दौरान लोक निर्माण विभाग के सब इंजीनियर भी मौजूद रहे।
कलेक्टर ने स्पष्ट निर्देश दिए कि सड़क निर्माण की गुणवत्ता से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह मार्ग केवल सड़क नहीं, बल्कि ग्रामीणों के लिए जीवनरेखा है। इसी रास्ते से बच्चे स्कूल जाएंगे, गर्भवती महिलाएं अस्पताल पहुंचेंगी और बीमारों को समय पर इलाज मिलेगा।
“सड़क का हर मीटर ग्रामीणों की सुरक्षा और सुविधा से जुड़ा है। गुणवत्ता और समयसीमा दोनों पर कड़ी नजर रखी जाए,” कलेक्टर ने मौके पर ही अधिकारियों को निर्देश दिए।

स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत जानी, ग्रामीणों से सीधा संवाद
दौरे के दौरान कलेक्टर ने पांगुड़ सहित अन्य गांवों के स्वास्थ्य केंद्रों का निरीक्षण किया। यहां उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों की उपस्थिति, मरीजों के उपचार, दवाओं की उपलब्धता और रिकॉर्ड संधारण की बारीकी से जांच की।
कलेक्टर ने ग्रामीण महिलाओं और बच्चों से सीधे संवाद कर यह जानने का प्रयास किया कि स्वास्थ्य सेवाएं वास्तव में उन तक पहुंच रही हैं या नहीं। गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और कुपोषित बच्चों के संबंध में जानकारी ली गई। स्वास्थ्यकर्मियों को नियमित उपस्थिति और सेवाओं में लापरवाही न बरतने के सख्त निर्देश दिए गए।
उन्होंने कहा कि अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं और इसमें किसी भी स्तर पर कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

स्कूल, आंगनबाड़ी और आश्रम शालाओं का सघन निरीक्षण
अनुपस्थित शिक्षकों पर सख्ती, नोटिस के निर्देश
शिक्षा की स्थिति को परखने के लिए कलेक्टर ने गारपा, पांगुड़, कोंगे और सितरम के प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों और बालक आश्रमों का सघन निरीक्षण किया।
निरीक्षण के दौरान जहां शिक्षक अनुपस्थित पाए गए, वहां कारण बताओ नोटिस जारी करने के निर्देश दिए गए। बच्चों की उपस्थिति, पाठ्यक्रम की प्रगति, मध्यान्ह भोजन, छात्रावास की साफ-सफाई और भोजन व्यवस्था का भी जायजा लिया गया।
कलेक्टर ने शिक्षकों से कहा कि दुर्गम इलाकों में पढ़ाने वाले शिक्षक केवल नौकरी नहीं, बल्कि भविष्य गढ़ने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। बच्चों को नियमित पढ़ाई, अनुशासन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना अनिवार्य है।

कभी डर का साया, आज भरोसे की शुरुआत
अबूझमाड़ का यह इलाका लंबे समय तक नक्सल हिंसा के कारण विकास से अछूता रहा। न सड़कें थीं, न स्कूलों तक नियमित पहुंच और न ही स्वास्थ्य सेवाएं। प्रशासनिक अमला भी इन गांवों तक पहुंचने में असहज महसूस करता था।
लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। सुरक्षा बलों की सक्रियता और प्रशासन की निरंतर मौजूदगी ने ग्रामीणों के मन से डर हटाना शुरू कर दिया है। कलेक्टर के दौरे के दौरान ग्रामीणों ने खुलकर अपनी समस्याएं बताईं और विकास कार्यों को लेकर उम्मीद जताई।

प्रशासनिक अमले को स्पष्ट संदेश
योजनाएं कागज पर नहीं, जमीन पर दिखें
दौरे के समापन पर कलेक्टर नम्रता जैन ने अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया कि अबूझमाड़ जैसे क्षेत्रों में योजनाओं की वास्तविक क्रियान्वयन रिपोर्ट ही मूल्यांकन का आधार होगी। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण—हर क्षेत्र में सुधार दिखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सरकार की मंशा है कि सुदूर और अंतिम गांव भी मुख्यधारा से जुड़ें और इसके लिए प्रशासन को पूरी संवेदनशीलता और ईमानदारी से काम करना होगा।




