जिन उंगलियों से लोकतंत्र डरता था, अब वही उंगलियां तय करेंगी देश का भविष्य
बंदूक से बैलेट तक का सफर: आत्मसमर्पित नक्सलियों को मिला मताधिकार, नक्सलवाद पर लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत

नक्सलवाद के अंधकार से बाहर निकलते भारत की यह तस्वीर नारायणपुर से उभरी है, लेकिन इसका संदेश पूरे देश के लिए है—
लोकतंत्र अपने शत्रुओं को भी अधिकार देकर जीतता है।

जहां मतदान अपराध था, वहां मतदाता बनने का उत्सव
दशकों तक नक्सलवाद की हिंसक विचारधारा के प्रभाव में रहे अबूझमाड़ और नारायणपुर जिले में मतदान को “राज्य का षड्यंत्र” बताया जाता रहा। चुनाव बहिष्कार, धमकियां और उंगलियां काटने की चेतावनियां यहां की कड़वी सच्चाई रही हैं।
आज उसी भूमि पर आत्मसमर्पित नक्सल प्रभावित नागरिक मतदाता बनने के लिए फॉर्म भरते दिखाई दिए। यह दृश्य केवल व्यवस्था का नहीं, बल्कि मानसिक गुलामी से मुक्ति का प्रतीक है।

पुनर्वास केन्द्र बना लोकतंत्र का प्रवेश द्वार
जिला प्रशासन नारायणपुर द्वारा आत्मसमर्पित नक्सल प्रभावित हितग्राहियों को सामाजिक मुख्यधारा में पुनः स्थापित करने की दिशा में एक और ऐतिहासिक पहल की गई।
कलेक्टर नम्रता जैन के निर्देश एवं मार्गदर्शन में 1 जनवरी 2026 को जिला परियोजना लाइवलीहूड कॉलेज नारायणपुर अंतर्गत संचालित पुनर्वास केन्द्र में विशेष मतदाता पंजीयन अभियान का आयोजन किया गया।
इस अभियान का उद्देश्य स्पष्ट था—
▪ आत्मसमर्पित हितग्राहियों को संवैधानिक मताधिकार प्रदान करना
▪ उन्हें नागरिक पहचान से जोड़ना
▪ लोकतांत्रिक व्यवस्था में सम्मानजनक भागीदारी सुनिश्चित करना
पहली बार लिखा गया नाम, पहली बार मिला अधिकार
अभियान के दौरान पुनर्वास केन्द्र में निवासरत आत्मसमर्पित हितग्राहियों के मतदाता सूची में नाम जोड़ने हेतु आवश्यक आवेदन फॉर्म पटवारी के माध्यम से पूर्ण कराए गए।
यह प्रक्रिया उन लोगों के लिए ऐतिहासिक रही, जिन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा—
- जंगलों में
- बंदूक के साए में
- लोकतंत्र से कटकर
बिताया।
अब वही लोग पहली बार अपने नाम, पते और पहचान के साथ भारत के मतदाता बनने की औपचारिक प्रक्रिया में शामिल हुए।
प्रशासन का स्पष्ट संदेश: संविधान सबके लिए
इस अवसर पर डॉ. सुमित गर्ग, डिप्टी कलेक्टर एवं एसडीएम ओरछा, सह नोडल अधिकारी पुनर्वास केन्द्र, ने आत्मसमर्पित हितग्राहियों को मतदाता पहचान पत्र की आवश्यकता और उपयोगिता के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि—
“वोटर आईडी केवल मतदान का अधिकार नहीं, बल्कि एक पूर्ण नागरिक होने की पहचान है। यही दस्तावेज व्यक्ति को योजनाओं, बैंकिंग, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा से जोड़ता है।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि—
- वोटर आईडी निर्माण हेतु आवश्यक दस्तावेज
- आवेदन की प्रक्रिया
- नाम दर्ज होने के बाद कार्ड प्राप्ति
- त्रुटि सुधार एवं संशोधन
की पूरी जानकारी सरल भाषा में दी गई, ताकि कोई भी पात्र हितग्राही वंचित न रहे।
जहां कभी लोकतंत्र को काटने की धमकी थी
यह वही इलाका है, जहां वर्षों तक नक्सल संगठन खुलेआम यह कहते रहे कि—
“जो वोट देगा, उसकी उंगली काट दी जाएगी।”
आज वही लोकतंत्र उन हाथों को सम्मानपूर्वक मताधिकार सौंप रहा है, जिन्होंने कभी इसके खिलाफ खड़े होने की भूल की थी।
यह बदले की राजनीति नहीं, बल्कि संविधान की उदारता और व्यवस्था की ताकत को दर्शाता है।
नक्सलवाद बनाम लोकतंत्र: निर्णायक मोड़
विशेषज्ञों का मानना है कि आत्मसमर्पित नक्सलियों को मतदाता बनाना नक्सलवाद की वैचारिक हार है।
जब कोई व्यक्ति मतदान करता है, तो वह—
- हिंसा के रास्ते से हटता है
- बंदूक छोड़ता है
- और संविधान को स्वीकार करता है
यह प्रक्रिया नक्सल संगठन की उस मानसिकता को तोड़ती है, जो हिंसा को समाधान मानती रही है।
आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की वापसी
पुनर्वास केन्द्र में मौजूद हितग्राहियों के चेहरों पर झिझक नहीं, बल्कि आत्मविश्वास था। कई हितग्राहियों ने कहा—
“पहली बार लग रहा है कि हम भी इस देश का हिस्सा हैं।”
यह वाक्य प्रशासन की पुनर्वास नीति की सबसे बड़ी सफलता को परिभाषित करता है।
पुनर्वास नीति: अधिकारों के साथ वापसी
जिला प्रशासन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पुनर्वास नीति—
- केवल आर्थिक सहायता
- कौशल प्रशिक्षण
- रोजगार
तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मसमर्पित हितग्राहियों को पूर्ण नागरिक अधिकारों के साथ समाज में स्थायी रूप से स्थापित करना इसका मूल उद्देश्य है।
नारायणपुर से उठती यह खबर एक स्पष्ट संदेश देती है—
भारत का लोकतंत्र इतना मजबूत है कि वह अपने विरोधियों को भी अधिकार देकर पराजित करता है।
जहां कभी उंगलियां काटने की धमकी थी,
आज वहीं उंगलियां मतदान कर भविष्य गढ़ने को तैयार हैं।
यही लोकतंत्र की असली जीत है।




