नारायणपुर

गारपा में छेरछेरा की गूंज: माड़िया जनजाति ने परंपरा, सामूहिकता और अन्न-सम्मान का उत्सव रचा

(कैलाश सोनी) नारायणपुर/अबूझमाड़। छत्तीसगढ़ राज्य के नारायणपुर जिले का अबूझमाड़—जहां दुर्गम पहाड़ियां, घने जंगल और परंपराओं से भरा जीवन एक अलग ही दुनिया रचते हैं—पौष पूर्णिमा के दिन लोकपर्व छेरछेरा के उल्लास से सराबोर हो उठा। गारपा क्षेत्र में निवास करने वाली माड़िया जनजाति के बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने मिलकर छेरछेरा को उसी आत्मीयता और विश्वास के साथ मनाया, जैसे सदियों से मनाया जाता रहा है। ढोल-नगाड़ों की थाप, डंडा नृत्य की लय और लोकगीतों की गूंज ने पूरे गांव-टोले को उत्सव में बदल दिया।

छेरछेरा पर्व नई फसल के घर आने की खुशी का प्रतीक है। अबूझमाड़ में यह पर्व केवल एक रस्म नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है—जिसमें दान, बराबरी और सामूहिकता की भावना केंद्र में रहती है। सुबह से ही माड़िया समाज के बच्चे और युवा पारंपरिक वेशभूषा में सजकर टोलियों में निकले। बालिकाओं ने रंगीन साड़ियां, कमरबंध और पारंपरिक आभूषण धारण किए, वहीं युवकों के हाथों में डंडे और वाद्ययंत्र थे। घर-घर पहुंचकर वे सामूहिक स्वर में पारंपरिक गीत गाते हुए अन्न और धान का दान मांगते दिखे।

छेरछेरा माई, कोठी के धान ला हर दे”—इस लोकपंक्ति की गूंज के साथ लोग अपने अन्न भंडार से धान, अनाज और प्रतीकात्मक दान निकालकर बच्चों को देते गए। माना जाता है कि इस दिन दिया गया दान घर-परिवार में सुख-समृद्धि लाता है और नई फसल का सम्मान करता है। माड़िया समाज में यह विश्वास गहराई से रचा-बसा है कि छेरछेरा के दिन कोई भी खाली हाथ न लौटे।

अबूझमाड़ में छेरछेरा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामूहिकता है। यहां उत्सव में अमीर-गरीब का भेद नहीं दिखता। हर घर, हर आंगन इस पर्व का हिस्सा बनता है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि छेरछेरा का मूल संदेश अहंकार को त्यागना और समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलना है। यही कारण है कि इस पर्व में बच्चों की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है—ताकि आने वाली पीढ़ी भी दान और सहभागिता के संस्कार सीख सके।

उत्सव के दौरान गांव की गलियों और पगडंडियों पर डंडा नृत्य की खास छटा देखने को मिली। ढोल की थाप पर थिरकते कदम, एक-दूसरे के साथ तालमेल—यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामूहिक अनुशासन और एकता का प्रतीक है। महिलाएं और पुरुष एक-दूसरे के साथ कदम मिलाते हुए आगे बढ़ते हैं, मानो यह संदेश दे रहे हों कि समाज तभी मजबूत होता है, जब सब साथ चलते हैं।

छेरछेरा पर्व का महत्व केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक भी है। नई फसल कटाई के बाद अन्न का दान यह याद दिलाता है कि मेहनत का फल केवल निजी संपत्ति नहीं, बल्कि साझा धरोहर है। माड़िया जनजाति की जीवन पद्धति प्रकृति और सामूहिक श्रम पर आधारित रही है, और छेरछेरा उसी सोच का उत्सव है।

बुजुर्गों के अनुसार, पौराणिक मान्यता है कि पौष पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी। इसी कारण इस दिन दान का विशेष महत्व माना जाता है। हालांकि अबूझमाड़ में यह मान्यता स्थानीय विश्वासों और लोकपरंपराओं के साथ घुल-मिलकर एक अलग ही स्वरूप ले लेती है, जहां देव-आस्था से अधिक समाज और अन्न का सम्मान प्रमुख रहता है।

आज के बदलते समय में भी अबूझमाड़ के माड़िया समाज ने छेरछेरा की मूल आत्मा को बचाकर रखा है। मोबाइल, आधुनिक जीवनशैली और बाहरी प्रभावों के बावजूद गांव के बच्चे पारंपरिक गीत और नृत्य सीख रहे हैं। यह अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि अबूझमाड़ की संस्कृति अभी भी जीवंत है।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि ऐसे पर्व ही उनकी पहचान हैं। छेरछेरा के बिना नई फसल की खुशी अधूरी मानी जाती है। यह पर्व सालभर के श्रम के बाद राहत और उल्लास का अवसर देता है, वहीं समाज को जोड़कर रखने का काम भी करता है।

अबूझमाड़ में मनाया गया यह छेरछेरा पर्व एक बार फिर यह संदेश देता है कि विकास और आधुनिकता के बीच भी परंपराओं की जड़ें मजबूत रह सकती हैं। माड़िया जनजाति का यह लोकपर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों की सीख है—जो बताती है कि अन्न का सम्मान, दान की भावना और सामूहिकता ही किसी समाज की असली पूंजी होती है।

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