काले झंडे से तिरंगे तक का सफर
मुख्यधारा में लौटे आत्मसमर्पित नक्सलियों ने 77वें गणतंत्र दिवस पर तिरंगे को किया सलाम, पुनर्वास की सफलता का बना प्रतीक

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। घोर नक्सल प्रभावित अबूझमाड़ की धरती, जहाँ कभी गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस का विरोध होता था, जहाँ काले झंडे फहराकर लोकतंत्र और संविधान को नकारा जाता था—वहीं इस वर्ष 77वां गणतंत्र दिवस इतिहास के एक नए अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। वर्षों तक नक्सली विचारधारा से जुड़े रहे और राष्ट्रीय पर्वों को “काला दिवस” मानने वाले आत्मसमर्पित नक्सलियों ने इस बार पूरे सम्मान, गर्व और उत्साह के साथ तिरंगे को सलामी दी। यह दृश्य केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि अबूझमाड़ के सामाजिक और वैचारिक परिवर्तन का जीवंत प्रमाण बन गया।


नारायणपुर जिले के पुनर्वास केंद्र में आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में आत्मसमर्पित नक्सलियों ने अपर कलेक्टर वीरेन्द्र बहादुर पंचभाई के साथ मिलकर ध्वजारोहण किया। जैसे ही तिरंगा फहराया गया, पूरे परिसर में राष्ट्रगान गूंज उठा। “भारत माता की जय”, “वंदे मातरम्” और “तिरंगे की जय” के नारों ने उस जगह को देशभक्ति के रंग में रंग दिया, जहाँ कभी संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ नारे लगाए जाते थे। यह क्षण वहां मौजूद हर व्यक्ति के लिए भावुक और अविस्मरणीय था।
जहाँ कभी विरोध था, आज वहीं गर्व
अबूझमाड़ लंबे समय तक नक्सलवाद का गढ़ रहा है। यहां गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के दिन अक्सर काले झंडे फहराए जाते थे और इन पर्वों का विरोध किया जाता था। नक्सली विचारधारा से प्रभावित लोगों को सिखाया जाता था कि ये दिन “काला दिवस” हैं। लेकिन समय, संवाद और पुनर्वास नीतियों ने तस्वीर बदल दी है।
आज वही लोग, जिन्होंने कभी तिरंगे को नकारा था, उसी तिरंगे को नमन करते नजर आए। यह परिवर्तन बताता है कि हिंसा और अलगाव के रास्ते पर चलने वाले भी यदि अवसर और विश्वास पाएं, तो मुख्यधारा में लौट सकते हैं।
तैयारियों में भी दिखी सहभागिता
इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि आत्मसमर्पित नक्सलियों की भागीदारी केवल औपचारिक नहीं थी। उन्होंने समारोह की तैयारियों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। परिसर को सजाने के लिए रंगोली स्वयं उनके हाथों से बनाई गई। रंगों से सजी ये आकृतियाँ मानो यह संदेश दे रही थीं कि अंधकार और हिंसा के रास्ते से निकलकर अब वे शांति, विकास और लोकतंत्र की राह पर आगे बढ़ चुके हैं।
रंगोली के हर रंग में नए जीवन की उम्मीद, सकारात्मक सोच और समाज से जुड़ने की चाह स्पष्ट झलक रही थी।
प्रशासन का संदेश: बदलाव संभव है
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अपर कलेक्टर वीरेन्द्र बहादुर पंचभाई ने इसे जिले के लिए ऐतिहासिक दिन बताया। उन्होंने कहा,
“आज का दिन नारायणपुर जिले के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पहली बार है जब आत्मसमर्पित नक्सली गणतंत्र दिवस मना रहे हैं, राष्ट्रगान गा रहे हैं और भारत माता की जय के नारे लगा रहे हैं। यह उनके जीवन में आए सकारात्मक परिवर्तन और संविधान के प्रति उनकी आस्था का प्रतीक है।”
उन्होंने आगे कहा कि शासन की पुनर्वास नीतियों का उद्देश्य यही है कि भटके हुए लोग मुख्यधारा में लौटें, सम्मानजनक जीवन जिएं और देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को समझें।
आत्मसमर्पित नक्सलियों की बदली सोच
समारोह के दौरान आत्मसमर्पित नक्सलियों ने भी खुलकर अपनी भावनाएं साझा कीं। उन्होंने बताया कि जंगल में रहते हुए उन्हें सिखाया गया था कि गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस “काला दिवस” हैं। लेकिन आज पहली बार उन्होंने तिरंगे को सम्मान दिया और राष्ट्रगान गाया।
एक आत्मसमर्पित नक्सली ने कहा,
“आज गणतंत्र दिवस के आयोजन में शामिल होकर हमें गर्व महसूस हो रहा है। अब हमें समझ में आ रहा है कि संविधान और लोकतंत्र हमारे अधिकारों की रक्षा करते हैं। पहले हमें जो सिखाया गया, वह अधूरा सच था।”
उनके शब्द इस बात का प्रमाण थे कि विचारधारा बदलने पर जीवन की दिशा भी बदल जाती है।
अबूझमाड़ में लौटता भरोसा
यह आयोजन केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि अबूझमाड़ में लौटते भरोसे और शांति का संकेत है। जिस इलाके को कभी हिंसा, भय और अविश्वास से जोड़ा जाता था, आज वहीं लोकतंत्र की स्वीकार्यता दिखाई दे रही है। आत्मसमर्पित नक्सलियों का गणतंत्र दिवस मनाना यह बताता है कि संवाद, पुनर्वास और विकास के माध्यम से बदलाव संभव है।
पुनर्वास नीति की सफलता का प्रतीक
नारायणपुर में मनाया गया यह 77वां गणतंत्र दिवस शासन की पुनर्वास नीति की सफलता को भी रेखांकित करता है। रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन की दिशा में किए गए प्रयासों ने उन लोगों को नई राह दिखाई है, जो कभी बंदूक के साए में जीने को मजबूर थे।
यह आयोजन यह संदेश भी देता है कि केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई ही नहीं, बल्कि संवेदनशील प्रशासन और भरोसे की पहल भी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी शांति ला सकती है।
देश के लिए प्रेरक उदाहरण
अबूझमाड़ से उठी यह तस्वीर केवल नारायणपुर या छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश के लिए एक प्रेरक उदाहरण है कि दशकों से हिंसा में उलझे लोग भी यदि सही दिशा, अवसर और समर्थन पाएं, तो लोकतंत्र और संविधान को अपना सकते हैं।
कभी काले झंडे फहराने वाला अबूझमाड़ आज तिरंगे के सम्मान में खड़ा है—यह परिवर्तन अपने आप में ऐतिहासिक है।
उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद
77वें गणतंत्र दिवस पर नारायणपुर में जो दृश्य सामने आया, वह शांति, पुनर्निर्माण और उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद को मजबूत करता है। यह आयोजन साबित करता है कि देश की मुख्यधारा में लौटना संभव है, और जब ऐसा होता है, तो न केवल व्यक्ति का जीवन बदलता है, बल्कि पूरे समाज की दिशा भी बदल जाती है।
अबूझमाड़ की धरती पर फहराता तिरंगा यह संदेश दे गया कि लोकतंत्र की शक्ति अंततः हर अंधकार को चीरकर अपना रास्ता बना लेती है।




