नारायणपुर

आपसी संवाद से सुलझा शव दफनाने का विवाद, आदिवासी समाज में परिवार की घर वापसी

बोरपाल में सामाजिक सौहार्द की मिसाल

नारायणपुर। जिले के बोरपाल गांव में शव के अंतिम संस्कार को लेकर उत्पन्न हुआ विवाद सोमवार को आपसी सहमति, संवाद और सामाजिक समझदारी से शांतिपूर्ण ढंग से सुलझ गया। घटनाक्रम ने गांव में सामाजिक एकता, परंपराओं के सम्मान और सौहार्द का सकारात्मक संदेश दिया।

गांव में ईसाई समुदाय में शामिल हुए एक परिवार के शव दफनाने को लेकर आदिवासी समाज की परंपराओं के उल्लंघन की आशंका जताई गई थी। इसी को लेकर बोरपाल ग्राम पंचायत क्षेत्र में आदिवासी समाज की ओर से जन आक्रोश रैली और धरना प्रदर्शन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण, समाज के पदाधिकारी और जनप्रतिनिधि शामिल हुए। ग्रामीणों ने एक स्वर में गांव की परंपरा और नियमों के पालन की बात कही।

कड़ी सुरक्षा में बना रहा शांति का माहौल
कांकेर जिले के आमाबेड़ा में पूर्व में हुई घटनाओं को देखते हुए प्रशासन ने सतर्कता बरतते हुए गांव में पुलिस की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की। पूरे घटनाक्रम के दौरान पुलिस की मौजूदगी से शांति और कानून व्यवस्था बनी रही।

समाज की बैठक में निकला समाधान
धरना प्रदर्शन के बाद गांव में समाज की बैठक आयोजित की गई, जिसमें आदिवासी समाज के वरिष्ठजनों, पदाधिकारियों और ग्रामीणों ने विचार-विमर्श किया। बैठक में ईसाई समुदाय में शामिल हुए वीरसिंह के परिवार को समाज की पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करने और पुनः समाज में शामिल होने की सलाह दी गई। लंबी चर्चा के बाद वीरसिंह के परिवार ने आदिवासी समाज की परंपराओं का पालन करने पर सहमति जताई।

माटी पूजा कर हुआ स्वागत
सहमति बनने के बाद गायता पटेल द्वारा माटी पूजा संपन्न कराई गई। इसके पश्चात तिलक लगाकर वीरसिंह और उनके परिवार का आदिवासी समाज में विधिवत स्वागत किया गया। इस दौरान ग्रामीणों ने शांति, भाईचारे और आपसी समरसता के साथ रहने का संदेश दिया।

समाज और परिवार की प्रतिक्रिया
वीरसिंह ने कहा कि उनका पूरा परिवार पुनः अपने आदिवासी समाज में लौट आया है और गांव के नियम, धर्म व परंपराओं का पालन करते हुए सभी के साथ मिल-जुलकर रहेगा।
पिछड़ा वर्ग समाज के अध्यक्ष गुलाब बघेल ने इसे शांतिपूर्ण सामाजिक समाधान बताते हुए कहा कि यह घटना समाज में आपसी समझ और परंपराओं के सम्मान का उदाहरण है।

समाज के वरिष्ठ सदस्य मंगऊ राम ने बताया कि 10 जनवरी को वीरसिंह के पिता के निधन के बाद ईसाई रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार की तैयारी थी, जिसका ग्रामीणों ने विरोध किया। समझाइश के बाद परिवार ने समाज में वापसी का निर्णय लिया, जिसे पूरे गांव ने स्वीकार किया।

बोरपाल की यह घटना आपसी संवाद, संयम और सामाजिक सौहार्द की एक सकारात्मक मिसाल बनकर सामने आई है।

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