16 नक्सलियों ने हथियार डाले: बोले- टॉप लीडर ही असली दुश्मन, हमें बना रखा था गुलाम

अबूझमाड़ से निकलकर नारायणपुर में एसपी के सामने किया सरेंडर, सभी को मिला 50-50 हजार का चेक, 2025 में अब तक 164 नक्सली हथियार छोड़ चुके
नारायणपुर |
बस्तर का अबूझमाड़ इलाका, जो कभी नक्सलियों का गढ़ माना जाता था, वहां से लगातार नक्सलियों के आत्मसमर्पण का सिलसिला जारी है। मंगलवार को जिले के घोर नक्सल प्रभावित लंका और डूंगा क्षेत्र से जुड़े 16 नक्सली संगठन छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ गए। इनमें जनताना सरकार सदस्य, पंचायत मिलिशिया डिप्टी कमांडर, पंचायत सरकार सदस्य, न्याय शाखा अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर काम करने वाले शामिल हैं।
आत्मसमर्पण करने वाले सभी को शासन की आत्मसमर्पण- पुनर्वास नीति के तहत 50-50 हजार रुपये का चेक सौंपा गया।
interrogation में खुलासा: “आदिवासियों को सपने दिखाकर बना लिया गुलाम”
सरेंडर के बाद पूछताछ में नक्सलियों ने बड़ा खुलासा किया। बोले–
- “शीर्ष कैडर के माओवादी लीडर्स ही आदिवासियों के सबसे बड़े दुश्मन हैं।”
- “जल, जंगल, जमीन और बराबरी की बात कर वे हमें झूठे सपने दिखाते रहे।”
- “असलियत यह है कि हमें संगठन में मजदूर से भी बदतर हालत में रखा जाता है।”
- “महिला साथियों का तो जीवन नरक बन चुका है, उनका शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से शोषण होता है।”
छोटे पद पर थे, पर काम बड़े करते थे
हालांकि सरेंडर करने वाले माओवादी संगठन में टॉप लीडर नहीं थे। लेकिन इनकी भूमिका नक्सलवाद को जिंदा रखने में अहम थी।
- ये लोग लड़ाकू दस्तों तक राशन, दवा और हथियार पहुंचाते थे।
- कई बार आईईडी लगाने, फोर्स की रेकी करने और मूवमेंट की जानकारी देने का काम भी करते थे।
- पुलिस ने इन्हें नक्सली संगठन का “स्लीपर सेल” बताया।
2025 में अब तक 164 नक्सली सरेंडर
पुलिस के मुताबिक, इस साल यानी 2025 में अब तक 164 छोटे-बड़े कैडर के नक्सली संगठन छोड़ चुके हैं।
- इनमें कई पंचायत मिलिशिया और जनताना सरकार के सदस्य शामिल रहे।
- सुरक्षा बलों की बढ़ती दबाव और लगातार कैंप स्थापित होने से नक्सलियों का मनोबल टूटा है।
- यही वजह है कि अब उनके पास आत्मसमर्पण करने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं बचा।
आत्मसमर्पण करने वालों के नाम
सरेंडर करने वालों में लच्छू पोड़ियाम, केसा कुंजाम, मुन्ना हेमला, वंजा मोहंदा, जुरू पल्लो, मासू मोहंदा, लालू पोयाम, रैनू मोहंदा, जुरूराम मोहंदा, बुधराम मोहंदा, चिन्ना मंजी, कुम्मा मंजी, बोदी मोहंदा, बिरजू मोहंदा, बुधु मज्जी और कोसा मोहंदा शामिल हैं। ये सभी लंका और डूंगा पंचायत क्षेत्र के रहने वाले हैं और लंबे समय से नक्सली गतिविधियों में शामिल थे।
एसपी रोबिनसन गुरिया ने कहा
“अबूझमाड़ के मूल निवासियों को नक्सलवाद की विचारधारा से बचाना ही हमारी प्राथमिकता है। हम चाहते हैं कि लोग भ्रम और हिंसा छोड़कर विकास की मुख्यधारा में शामिल हों। अब समय है कि अबूझमाड़ अपने असली निवासियों को वापस मिले।”
आईजी सुंदरराज पी. ने कहा
“साल 2025 में सुरक्षा बलों की कार्रवाई से माओवादी संगठन को भारी नुकसान हुआ है। टॉप लीडर्स मारे गए हैं। अब संगठन के पास हिंसा छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।”
नक्सलियों की सोच क्यों बदल रही है?
- गांव-गांव में पुलिस कैंप और सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ी।
- सड़क, पुल, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र जैसे विकास कार्य तेज हुए।
- नक्सली संगठन के भीतर ही भेदभाव और शोषण बढ़ा।
- टॉप लीडर विलासिता में, जबकि स्थानीय नक्सली गरीबी और दबाव में।
- लगातार चल रहे आत्मसमर्पण से संगठन के भीतर अविश्वास फैला।
महिला नक्सलियों पर सबसे ज्यादा अत्याचार
इंट्रोगेशन में महिला नक्सलियों की स्थिति पर भी बड़ा खुलासा हुआ।
- उन्हें निजी जीवन की कोई स्वतंत्रता नहीं दी जाती।
- टॉप लीडर उन्हें अपनी दासी की तरह रखते हैं।
- शहरों और विदेशों में बसाने के झूठे सपने दिखाकर उनका शोषण किया जाता है।
- कई महिलाएं इसी कारण संगठन छोड़ चुकी हैं या मौका मिलते ही भाग रही हैं।
सरेंडर करने वालों को क्या मिलेगा?
- 50-50 हजार रुपये प्रोत्साहन राशि का चेक पहले ही दिया गया।
- शासन की नीति के तहत उन्हें घर, शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी।
- सभी को पुनर्वास पैकेज का लाभ मिलेगा ताकि वे सामान्य जिंदगी जी सकें।
ग्राउंड लेवल पर असर
लोगों का कहना है कि अबूझमाड़ में हालात तेजी से बदल रहे हैं।
- पहले जहां लोग नक्सलियों के डर से खुलकर बात नहीं करते थे, अब पुलिस कैंप आने से माहौल बदल रहा है।
- बच्चे पढ़ाई करने लगे हैं, महिलाएं पंचायत कामकाज में आगे आ रही हैं।
- आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के परिवार भी अब राहत महसूस कर रहे हैं।
नक्सलियों का “स्लीपर सेल” क्या होता है?
नक्सली संगठन में जो लोग सीधे लड़ाई में शामिल नहीं होते, लेकिन लड़ाकू दस्तों के लिए खाना, दवा, हथियार या सूचना जुटाते हैं, उन्हें “स्लीपर सेल” कहा जाता है। ये संगठन की रीढ़ की हड्डी की तरह होते हैं। पुलिस का मानना है कि लंका और डूंगा के आत्मसमर्पण करने वाले ऐसे ही “स्लीपर सेल” की भूमिका निभाते थे।




