65 किलोमीटर पैदल सफर… आधार अपडेट के लिए अबूझमाड़ के ग्रामीणों की जद्दोजहद

परिवार सहित दो-दो रातें जंगल-पहाड़ पार कर बिताते हैं रास्ते में, जरूरी सेवाओं की गांव तक नहीं है पहुंच…
नारायणपुर, 20 जुलाई। एक ओर जहां सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘डोर-टू-डोर’ सेवाओं की बात कर रही है, वहीं नारायणपुर जिले के दुर्गम अबूझमाड़ क्षेत्र के ग्रामीण आज भी आधार कार्ड जैसे बुनियादी कार्यों के लिए 65 किलोमीटर पैदल सफर करने को मजबूर हैं। बारिश के इन कठिन दिनों में जब नदी-नाले उफान पर होते हैं, तब भी ये ग्रामीण परिवार सहित जिला मुख्यालय पहुंचने का जोखिम उठाते हैं।

जंगल-पहाड़, नदी-नाले पार कर निकलते हैं दो दिन पूर्व
अबूझमाड़ के कच्चा पाल इलाके में स्थित ग्राम पंचायत धुरबेडा के आश्रित ग्राम फरसबेड़ा से जिला मुख्यालय की दूरी लगभग 65 किलोमीटर है। यहां से निकलने वाले ग्रामीण दो दिन पूर्व ही अपने सफर की शुरुआत करते हैं। भारी बारिश, कीचड़ और फिसलन भरे रास्तों को पार करते हुए वे नदी-नालों को पार करते हैं और सफर के बीच में एक रात्रि विश्राम भी करते हैं। जहां रात होती है, वहीं जंगल में रुककर आग जलाकर खाना बनाते हैं और परिवार के साथ वहीं विश्राम करते हैं।
दूसरे दिन जिला मुख्यालय पहुंच कर करवाते हैं कार्य
अगले दिन सुबह फिर ये परिवार अपना सफर शुरू करते हैं और दोपहर बाद नारायणपुर पहुंचते हैं। आधार केंद्र में घंटों कतार में खड़े रहकर बच्चों के आधार कार्ड के लिए आवेदन करते हैं और पुराने कार्ड को अपडेट करवाते हैं। शाम होते-होते जब काम पूरा होता है, तब वे जिला मुख्यालय में किसी सुरक्षित स्थान पर रात गुजारते हैं और तीसरे दिन फिर उसी दुर्गम रास्ते से अपने गांव लौटते हैं।
“गांव में सुविधा होती तो क्यों करते इतनी मशक्कत?”
जब हमारी टीम कच्चापाल इलाके के दौरे पर थी, तब रास्ते में फरसबेड़ा के ग्रामीणों से मुलाकात हुई। ग्रामीण कोसा ने रास्ते पर ही अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा, “अगर हम आधार अपडेट नहीं करवाएं तो राशन मिलना मुश्किल हो जाता है। बच्चों के लिए तो अब हर योजना में आधार जरूरी है। पर हमारे गांव में यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। मजबूरी में यह लंबा सफर करना पड़ता है।”
“बस सेवा बंद, सड़के बंद, फिर भी सरकारी कार्य जरूरी”
एक अन्य ग्रामीण सोमारु ने बताया कि कुछ समय पूर्व बस सेवा चालू हुई थी, लेकिन बरसात के साथ ही दुबारा बंद हो गई। “सड़कें इतनी खराब हो गई हैं कि वाहन चलाना तो दूर, पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है। फिर भी हमें जिला मुख्यालय जाना पड़ता है। आज मैं अपने परिवार के आधार अपडेट और दो छोटे बच्चों के नए आधार के लिए निकला हूं।”
अबूझमाड़ का यथार्थ: जंगलों में बसा आदिवासी जीवन
अबूझमाड़ छत्तीसगढ़ के सबसे दुर्गम इलाकों में से एक है। यह पहाड़ी, जंगली और आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है, जहां अबूझमाड़िया जनजाति निवास करती है। यह जनजाति पारंपरिक रूप से जंगल पर निर्भर रही है। लेकिन आज सरकारी योजनाओं से जुड़ने के लिए उन्हें डिजिटल दस्तावेजों की आवश्यकता है। पर उनके गांवों में न आधार केंद्र है, न इंटरनेट, न बैंकिंग सुविधाएं। ऐसे में हर सरकारी कार्य के लिए उन्हें नारायणपुर जैसे जिला मुख्यालय का रुख करना पड़ता है।
बरसात बनी और बड़ी बाधा
बारिश के इन दिनों में अबूझमाड़ में स्थित नदी-नाले उफान पर होते हैं। सड़कों का नामोनिशान मिट जाता है। गांव के रास्ते इतने कीचड़ भरे होते हैं कि वहां पैदल चलना भी जोखिम भरा हो जाता है। कई जगहों पर ग्रामीण रस्सियों के सहारे नदियां पार करते हैं। ऐसे में 65 किलोमीटर का यह सफर किसी चुनौती से कम नहीं होता।
सरकार से मांग: गांव में मिले आधार सुविधा
ग्रामीणों की मांग है कि यदि ग्राम पंचायत या आसपास के क्षेत्र में ही आधार अपडेट और पंजीयन की सुविधा उपलब्ध करवा दी जाए तो वे इस संघर्ष से बच सकते हैं। इससे न केवल समय और श्रम की बचत होगी, बल्कि उन्हें जोखिम भरे सफर से भी राहत मिलेगी।
एक ओर जहां स्मार्ट शहरों की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर अबूझमाड़ जैसे क्षेत्र आज भी आधार जैसी मूलभूत सेवा के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। सरकार को चाहिए कि इन दूरस्थ और दुर्गम इलाकों में मोबाइल आधार सेवा, आधार शिविर या पंचायत स्तर पर सुविधा केंद्र खोले जाएं, ताकि आदिवासी समाज को उनकी आवश्यक सेवाएं सुलभ हो सकें। नहीं तो ‘डिजिटल इंडिया’ का सपना अबूझमाड़ के लिए एक सपना ही बना रहेगा।






