नारायणपुर

नक्सलियों की राजधानी कहे जाने वाले कुतुल में पहली बार बैखौफ मेला, ढोल-नगाड़ों पर थिरके ग्रामीण

महिलाओं-बच्चों ने लिया चाऊमीन-मोमोज का स्वाद, देवी-देवताओं से मांगी सुख-शांति की कामना…

नारायणपुर। अबूझमाड़ के जिस कुतुल को एक समय नक्सलियों की अघोषित राजधानी कहा जाता था, वहां अब बदलाव की बयार चल रही है। पहली बार यहां सैकड़ों ग्रामीणों ने बिना किसी डर के सामूहिक रूप से मेला मनाया। गुरुवार रात 7 बजे शुरू हुए इस मेले में ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों की थाप पर रातभर पारंपरिक नृत्य किया और देवी-देवताओं का आशीर्वाद लिया। शुक्रवार सुबह तक नाच-गाने का सिलसिला जारी रहा।

बदलते कुतुल की तस्वीर: मेले में दिखा नया रंग
मेले में सुबह होते ही दुकानों पर भीड़ उमड़ पड़ी। पहली बार कुतुल जैसे दूरस्थ गांव में चाऊमीन, मोमोज, बर्फ के गोले और आइसक्रीम जैसे पकवानों की दुकानें सजीं। बच्चे से लेकर बुजुर्गों तक ने इन स्वादों का भरपूर आनंद लिया। ग्रामीणों ने कहा कि अब वे चाहते हैं कि अगले साल झूले, ड्रैगन ट्रेन और और भी मनोरंजन के साधन मेला स्थल पर उपलब्ध हों, ताकि नारायणपुर जैसे शहरों की तर्ज पर कुतुल में भी त्योहार मनाया जा सके।

पुलिस कैंप ने बदली फिजा, व्यापारी भी पहुंचे बड़ी संख्या में
पुलिस की ओर से स्थापित बेस कैंप और सुरक्षा व्यवस्था की वजह से अबूझमाड़ में स्थायित्व बढ़ा है। इसी का नतीजा है कि व्यापारी भी अब इस क्षेत्र में व्यापार की संभावना देख रहे हैं। मेले में इस बार पहली बार खाने-पीने के कई स्टॉल्स और छोटी दुकानों ने रंग जमाया।

प्रशासन बना रहा दूरी, ग्रामीणों ने खुद की व्यवस्था
हालांकि, जिले का प्रशासन इस मेले से दूर ही नजर आया। न पीने के पानी की व्यवस्था की गई और न ही नृत्य स्थल पर पर्याप्त प्रकाश। छांव और रुकने की व्यवस्था भी ग्रामीणों को खुद करनी पड़ी। ग्रामीणों का कहना है कि अगर जिला प्रशासन सहयोग करता, तो यह मेला ऐतिहासिक रूप ले सकता था।

मेले ने दिया संदेश: कुतुल अब डरता नहीं
एक दौर था जब कुतुल में न कोई मेले की सोच सकता था, न ही सामूहिक नृत्य की आवाज गूंजती थी। लेकिन इस आयोजन ने साबित कर दिया कि अब कुतुल डर की जंजीरों को तोड़कर उत्सव की राह पर बढ़ चुका है।

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